प्रबुद्ध बनना ही सत्य की ओर पहला कदम है, प्रबुद्ध बनना धर्म है। प्रबुद्ध बनना पूजा है। प्रबुद्ध बनाना परम कर्तव्य है।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते: श्रीमद्भगवद्गीता(अध्याय 4, श्लोक 38)
बिना जाने किसी बात को मान लेना अंधविश्वास है।
और बिना जाने किसी बात को ठुकरा देना भी अंधविश्वास है।
दोनों स्थितियों में अंतर केवल दिशा का है, परंतु आधार एक ही है—अज्ञान।
सत्य का मार्ग न अंधी-स्वीकृति का है और न अंधे-निषेध का। सत्य का मार्ग है—जिज्ञासा, अध्ययन, तर्क, अनुभव और विवेक।
मंदिर हमारे मानव जीवन की सबसे ऊँची चीज़ है। आखिर जिम्मेदार पर प्रश्न नहीं उठेगा तो किससे पूछें? हमें अधिकार है और कर्तव्य भी है कि हम अपने वेदों से, अपने प्रबुद्धों से, अपने पंडितों यानी जानकारों यानी ज्ञानियों से विनम्रतापूर्वक पूछें ।
यदि कोई परंपरा, कोई प्रथा या कोई व्याख्या हमें अन्यायपूर्ण लगे, यदि हमारा विवेक और हमारी आत्मा उसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, तो हमें पहले उसे समझने का प्रयास करना है । संभव है कि हमारी समझ अधूरी हो। इसलिए पहला कदम विरोध नहीं, बल्कि ज्ञान की खोज है ।
और ये चीज़ तो हमें सरासर गलत लग रही, अन्यायपूर्ण लग रही। हमारा मन और आत्मा इसे स्वीकार करने से बिल्कुल मना कर रही। इसे बदलो या इसके कल्याणकारी महत्व और परिणाम बताओ हमें।
यदि गहराई से अध्ययन, तर्क, शास्त्र और अनुभवी विद्वानों से चर्चा करने के बाद भी कोई बात अन्यायपूर्ण ही प्रतीत हो, तब इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को सत्य तक पहुँचाना है, न कि उसे अंधविश्वास में बाँध देना।
कहीं कबीर साहब कहते हैं कि जीवहत्या पाप है। किसी ने कहा कि वेदों में लिखा है, तो वे महान बुद्धधा कहते हैं कि अगर वेदों में लिखा है तो वेद भी गलत है, पर जीवहत्या किसी भी स्तर पर उचित नहीं है। बस ये घोर पाप है।
इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता (2.46) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
"यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥"
अर्थात, जैसे चारों ओर जल से भरे विशाल सरोवर के सामने छोटे कुएँ की उपयोगिता सीमित रह जाती है, उसी प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति के लिए वेदों का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। इसका अर्थ वेदों का अपमान नहीं, बल्कि यह है कि उनका अंतिम लक्ष्य आत्मज्ञान है। जब लक्ष्य प्राप्त हो जाए, तब साधन का स्थान बदल जाता है।
हमें जानना है, हमें विरोधी नहीं बनना है। हमें केवल सत्य के समर्थक और सत्यगामी बनना है। इसलिए जो भी ईश्वर के नाम पर कुछ बातें कह दी जाती हैं और हमारा मन स्वीकार न कर पाए, तो पहले जानने की कोशिश करेंगे कि हमारे सामने अंधकार तो नहीं है।
यदि इन सबके बाद भी हमारा अंतःकरण कहे कि यहाँ अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार या स्वार्थ है, तब उस आवाज़ को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। फिर गलत लग रहा है तो हमारी आत्मा ही परमात्मा की आवाज़ है कि ये भ्रष्टाचार फैला है, पुरुषोत्तम के नाम पर।
भारतीय दर्शन में अंतःकरण (विवेक) को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। परंतु साथ ही यह भी कहा गया है कि विवेक को ज्ञान, अध्ययन और साधना से परिष्कृत करना आवश्यक है, क्योंकि केवल व्यक्तिगत भावना ही अंतिम प्रमाण नहीं मानी जाती।
अहंकार, द्वेष और पूर्वाग्रह से प्रश्न करना अनुचित हो सकता है, लेकिन विनम्रता, जिज्ञासा और सत्य की खोज के लिए प्रश्न करना स्वयं भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है।
क्योंकि अंततः धर्म का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या परंपरा की रक्षा नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, करुणा और मानव कल्याण की स्थापना है।
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