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अधिकारी बलि का बकरा, नेता सुरक्षित तर्कों के आईने में इंदौर जल-त्रा सदी

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 अगर अधिकारी दोषी हैं, तो यह मानना पड़ेगा कि जनप्रतिनिधि या तो अयोग्य थे या जानबूझकर चुप थे। दोनों ही स्थिति में वे दोषी बनते हैं। इंदौर में दूषित पानी से लोगों की मौत हुई। यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं थी, यह जवाबदेही की सुनियोजित हत्या थी। सरकार ने तुरंत कुछ अधिकारियों को हटाकर और निलंबित करके संदेश दिया कि कार्रवाई हो गई। लेकिन अगर इस पूरे मामले को तर्क की कसौटी पर परखें, तो साफ़ दिखता है कि यह कार्रवाई नहीं, सिर्फ परदा डालने की कोशिश है।   समस्या ज़मीन पर थी, फैसले ऊपर होते हैं गंदा पानी किसी फाइल में नहीं बहता, वह मोहल्लों में, गलियों में और घरों में बहता है। जिस इलाके में पानी दूषित था— वहां का पार्षद रोज़ जाता है, वहीं का विधायक वोट मांगने आता है,  वहीं के नेता मंच से भाषण देते हैं अगर अधिकारी दोषी हैं, तो यह मानना पड़ेगा कि जनप्रतिनिधि या तो अयोग्य थे या जानबूझकर चुप थे। दोनों ही स्थिति में वे दोषी बनते हैं।   शिकायत का पहला दरवाज़ा नेता होता है कोई आम नागरिक सीधे नगर आयुक्त के पास नहीं जाता। वह पहले—  पार्षद को फोन करता है,  विधायक से मिलता है, नेता ...