देश के हर कोने-कोने में देशभक्त लोग भरे पड़े हैं। पर शासन में बैठे लोग अपने ऊपर आँच न आए, इसलिए उनको दबा देते हैं। मणिपुर की आवाज पूरे देश में फैलने नहीं देते। कई सारे भारत तिवारी मार दिए जाते हैं।

 अयोग्यों का शासन , हमें बदलाव की जरूरत है

{ Rule of the Unworthy: Does India Need a Better System of Governance? }

दुनिया सदा प्रगति करती है। कोई शक नहीं है कि दुनिया ने प्रगति नहीं की है। लोगों ने जिस गति से हवाई जहाज बनाया, उसी गति से सामाजिक मूल्य भी बनाए और सामाजिक व्यवस्थाएँ भी बनाई।

जन-विकास की कड़ी में लोग ऐसे भी हुए जो कमजोरों को दबाया करते थे। यह एक जीव की प्रवृत्ति है। चाहे इंसान हो या जानवर, हर कोई अपने से कमजोर को दबा रहा है, तब से लेकर आज तक। उसी का प्रारूप है कि हमारे यहाँ मुगल, मंगोल से लेकर अंग्रेजों तक ने यहाँ आकर दबाना चाहा और कई हद तक हमें क्षति भी पहुँचाई। पर साथ ही ऐसे लोग भी हुए जिन्होंने अत्याचारियों से लोगों को बचाने के लिए डटकर सामना किया, कुछ सामाजिक नियम-कानून बनाए, कुछ व्यवसाय बनाए।


Illustration representing Indian democracy, corruption, taxpayers, political leadership, governance reforms, and the need for a better system of administration.


इसी का नतीजा निकलकर आया कि राजा-रजवाड़ों ने जन्म लिया। मुट्ठी भर बुरे लोगों से समाज को बचाने के लिए राजधर्म और राजतंत्र बने। समय-समय पर सामाजिक व्यवस्थाएँ बनीं, बिगड़ीं, फिर नई बनीं। और राजतंत्र बना तो यह बहुत समय तक चला। समय के साथ इसमें भी विक्षेप आ गए, तो कहीं-कहीं लोकतंत्र ने जन्म लिया और यह राजतंत्र से बेहतर साबित हुआ। इसलिए लगभग पूरी दुनिया ने इसे अपनाया।

इन सब क्रांतियों के पीछे एक ही उद्देश्य रहा कि सब लोग सुखी हो पाएँ, बेहतर जीवन जी पाएँ, खुलकर जी पाएँ। कहीं कोई सामाजिक व्यवस्था थोप दी हो, तो उसमें वे लोग घुटकर मर न जाएँ। कहीं-कहीं अपनी स्वयं की प्रवृत्तियों में भी पड़कर वे अपना जीवन बर्बाद न कर लें, दुखी न हो जाएँ। इसके लिए बेहतर परंपराओं और आध्यात्मिक शिक्षाओं का सहारा लिया गया।

और कुछ लोग सदा यहाँ जन्मे जो इस संसार को सुंदर बनाने के लिए अपना पूरा जीवन दे देते हैं। साथ ही कुछ लोग ऐसे भी जन्म लेते हैं जो इस संसार को दुख पहुँचाने के लिए ताक में बैठे रहते हैं कि कब मौका मिले और ज़िंदगियाँ तहस-नहस करें।



जब हमारे देश ने लोकतंत्र को अपनाया, तो निस्संदेह यह राजतंत्र से एक बेहतर परंपरा है। यदि राजा अच्छा न हो, तो जीवन भर उसे झेलना होता था। कई राजाओं की लड़ाई में नागरिक बेकार ही मारे जाते थे। राजा का किसी भी बात पर विरोध करना आसान नहीं होता था, यदि राजा एक अच्छा व्यक्ति न हो।

पर अब लोकतंत्र उससे बेहतर व्यवस्था है, क्योंकि सामान्य जनों की ताकत इसमें थोड़ी बढ़ी है। पर यहाँ भी बुरे लोग हावी हो रहे हैं। चुनाव जीतने के लिए वे बड़े-बड़े व्यवसायियों से चंदा लेते हैं। फिर सत्ता में आने के बाद कोई सरकारी टेंडर निकलता है, तो नेताओं को वह टेंडर उन्हीं व्यापारियों को देना पड़ता है।

अब वह चाहे कैसा भी रोड बनाए, कैसी भी बिल्डिंग बनाए, या कैसी भी दवाइयाँ बनाए, या प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियाँ चलाए, तो सरकार में बैठे उन नेताओं की इतनी औकात नहीं कि कंस्ट्रक्शन और प्रोडक्शन कंपनियों को कुछ कह पाएँ। चाहे उस उत्पाद की वजह से लोग मर चुके हों, चाहे सैकड़ों लोग मर जाएँ या हजारों लोग मर जाएँ, सरकार कुछ नहीं बोल पाती। लोग विरोध पर बैठें या आत्महत्या करें, सरकार का बस एक रवैया होता है कि चुप बैठो, लोग कितनी भी बड़ी घटना हो, एक-दो महीने में चुप हो जाएँगे। और जैसे ही चुनाव आएँगे, लाड़ली बहनों को कुछ पैसे दे देंगे, बिजली बिल कम कर देंगे, पेट्रोल पर पाँच-दस रुपये कम कर देंगे और ये चुनाव जीत जाएँगे।

यह एक राजा की, या देशभक्त की, या सच्चे देशसेवक की मानसिकता नहीं है। यह दुष्ट लोगों की मानसिकता है कि वे राज और राष्ट्रधर्म में व्यापारिक बुद्धि का उपयोग करते हैं। यहाँ व्यापारी बुद्धि की निंदा नहीं है, उसे गलत जगह उपयोग करने की बात है। जैसे अभिनेता का पेशा है कि वह नकलबाज़ी करे, पर क्या वह राजनीति में करेगा, सेवा में करेगा? और आज के नेता तो वैसे कर ही रहे हैं। वे अभिनेता भी बने हुए बैठे हैं और व्यापारी भी बने बैठे हैं। वे देश की, राष्ट्र की उन्नत व्यवस्थाओं का सौदा करते हैं। यह अपने निजी स्वार्थ के लिए, खुद बचने के लिए, कई लोगों की हत्याएँ करवा देते हैं। कई देशों को नक्शे से मिटा देते हैं।

और यह भी सही है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार बहुत ज़्यादा है, तो हमें कुछ नई चीज़ सोचने की आवश्यकता है। लोग कांग्रेस या अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों से तंग आ चुके थे। पर उस बीच भाजपा आई और बड़े प्रभावी बनकर नरेंद्र मोदी आए। सारे व्यापारियों से लेकर किसान, सेना, वैज्ञानिक सब खुश थे और उन्होंने लगभग 6-7 साल अच्छा काम भी किया, लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे। पर अब क्या हुआ? भाजपा वहीं खड़ी है जहाँ कांग्रेस है। आज हमारे लिए उम्मीद की किरण कौन-सी है? कोई निस्वार्थ और ईमानदारी के साथ यह बात बता सकता है?

इसलिए हमें इस लोकतंत्र में एक नई परंपरा बनाने की जरूरत है। न तो तमिल देशविरोधी है, न कश्मीर, न ही पंजाब देश से अलग होना चाहता है और न ही मणिपुर या असम। न ही यहाँ के मुसलमान देशविरोधी हैं, न दलित हिंदू-विरोधी हैं। बस जब सामाजिक व्यवस्था में उसका मूल्य कम आँका जाता है, तो विरोध उठना स्वाभाविक है। और यही विरोध क्रांति लाता है, शांति लाता है, नई और बेहतर व्यवस्था लाता है।

यहाँ इस देश के हर कोने-कोने में देशभक्त लोग भरे पड़े हैं। पर शासन में बैठे लोग अपने ऊपर आँच न आए, इसलिए उनको दबा देते हैं। मणिपुर की आवाज पूरे देश में फैलने नहीं देते। कई सारे भारत तिवारी मार दिए जाते हैं।

और रही बात टैक्सपेयर्स की, तो वे अपनी कमाई का 5%, 10%, 20% हिस्सा सरकार को दे रहे हैं। हर 1 लीटर पेट्रोल पर सरकार को 50-60 रुपये दे रहे हैं, ताकि यह देश शक्तिशाली बने, यहाँ सड़कें अच्छी हों, यहाँ के लोग विकसित हों, अच्छा पानी मिले, अच्छा खाना मिले।

पर क्या मिलता है? अगर बाप पैसे लगाकर बच्चे को पढ़ा रहा है और बच्चा मक्कार है, नालायक है, तो बाप भी पैसे देना बंद कर देता है। पर हमारे पास वह भी विकल्प नहीं है। इसलिए लोग बेहद गुस्से में भरे हुए हैं। इसलिए उनकी ईमानदार कमाई के पैसों से नेता लोग ज़मीनें खरीद रहे हैं, महंगी-महंगी गाड़ियाँ खरीद रहे हैं। एक फायर ब्रिगेड बाइक 2.5 लाख की आती है, उसे 8 लाख की बता दी जाती है। डायल 100 की जगह 102 शुरू होती है। यह नाम बदलने और पहचान बदलने से क्या होगा? इससे यह होगा कि जो चुनाव में खर्च हुआ है, उसका 10 गुना वापस आ जाता है।

यह वही पैसा है जो एक टैक्सपेयर 30 हजार महीना कमाकर देता है। लगभग 2-3 हजार टैक्स में दे रहा है, महीने का 6 हजार का पेट्रोल डलवा रहा है और उसमें से 3000 सरकार को दे रहा है। यहाँ लोगों को मजबूरन अपनी कमाई का 30-40% खर्च करके प्राइवेट स्कूल भेजना पड़ रहा है। ऊपर से प्राइवेट स्कूल हर साल किताबें बदलते हैं और वे भी एक ही विशेष जगह पर मिलती हैं। आज भी लोगों के घर में सब्जियाँ, चीनी और तेल नहीं मिल पा रहे हैं। और नेताओं की, इनके रिश्तेदारों की संपत्ति एक साल में दोगुनी हो जाती है। यहाँ उदाहरण देने के लिए कोई एक विशेष नेता नहीं है, किसी को भी उठा लो, वह ऐसा ही है। पर एक अच्छे नेतृत्व और व्यवस्था की बात करेंगे, तो हमें कोई उदाहरण मिलना बड़ा कठिन हो जाएगा।

इसलिए क्या हम एक नई व्यवस्था बना सकते हैं, जिसमें जो देशसेवा के लिए एकदम मर-मिटने वाले हों, भारत तिवारी हों, उनके हाथों में अपना देश सौंपें, उनके हाथों में अपने पैसे सौंपें। कब तक देशभक्त बलिदान होते रहेंगे और भेड़िए देश को नोचते रहेंगे? हमें और देशभक्तों का बलिदान नहीं चाहिए। हमें देश के लिए, समाज के लिए अब जीना है। मरना है उनको जो देश के दुश्मन हैं, जो इसे नोच रहे हैं।

जैसा कवि श्रीकृष्ण सरल ने अपनी कविता "राष्ट्र के श्रृंगार" में कहा है—

"सिंह की खेती किसी सियार को खाने न देना।"

बस बहुत हो चुका। हम अब और नहीं सहन कर सकते।  

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